'एक पंथ दो काज' की कहावत को चरितार्थ करते हुए छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में ‘गार्बेज कैफे’ एक ऐसा प्रयास है, जिससे कई मुश्किलों का हल एक साथ निकल रहा है। यह एक ऐसा कैफे है जहां रुपयों के अभाव में लोगों को प्लास्टिक वेस्ट के बदले भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे न सिर्फ प्लास्टिक वेस्ट रीसाइकल हो रहा है, बल्कि शहरी स्वच्छता सुनिश्चित हो रही है और जरूरतमंदों को स्वाभिमान से भरपेट भोजन भी मिल रहा है। आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के मार्गदर्शन में स्वच्छ भारत मिशन–शहरी (SBM-U) 2.0 ऐसे नवाचारों के जरिए देश भर के शहरों में कचरा प्रबंधन और स्वच्छता के नए मानक तय कर रहा है।
छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले स्थित अंबिकापुर नगर निगम द्वारा शुरू किया गया 'गार्बेज कैफे' एक व्यावहारिक और प्रभावकारी पहल है। यह मॉडल सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट को सीधे सोशल वेलफेयर से जोड़ता है, जहाँ गरीब, बेघर और कचरा बीनने वाले लोग प्लास्टिक कचरा जमा करके उसके बदले मुफ्त और पौष्टिक भोजन प्राप्त कर सकते हैं। अधिक से अधिक लोगों की पहुँच में लाने के लिए इस कैफे को प्रतीक्षा बस स्टैंड के पास स्थापित किया गया है। शहरी स्थानीय निकाय (ULB) ने इसे बिना वित्तीय रुकावट के लगातार चलाने के लिए एक सस्टेनेबल मॉडल अपनाया है। एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) प्रक्रिया के जरिए एकमुश्त प्रीमियम और मासिक किराया देकर एक एजेंसी इसको संचालित करती है। इस कैफे में कुल 10 टेबल हैं, जिनमें से 2 टेबल खास तौर पर प्लास्टिक कचरा लाकर भोजन करने वालों के लिए आरक्षित हैं, जबकि 8 टेबल एजेंसी के अपने नियमित व्यवसाय के लिए हैं।
यह मॉडल शहरी स्वच्छता का ऐसा ईको-सिस्टम बनाता है जहाँ हर पक्ष के लिए स्पष्ट लाभ (Win-Win Model) छिपे हैं। एजेंसी को बस स्टैंड जैसे प्राइम लोकेशन पर दुकान और 8 टेबलों से नियमित व्यावसायिक आय के साथ-साथ बड़ी ब्रांड वैल्यू, सामाजिक प्रतिष्ठा और मुफ्त पब्लिसिटी मिलती है। नगर निगम को एकमुश्त प्रीमियम और नियमित मासिक राजस्व मिलता है, जिससे ULB पर बिना वित्तीय बोझ पड़े शहर की सड़कों, नालियों और सार्वजनिक स्थानों से प्लास्टिक कचरा समाप्त होता है और शहर डंप-साइट मुक्त बनता है। वहीं, आम नागरिकों को वेस्ट निपटाने का जरिया मिलने से स्वच्छता बोध (Civic Sense) बढ़ता है और बेघर लोगों को भोजन पाने का गरिमापूर्ण माध्यम मिलता है।
यह कैफे एक सरल इंसेंटिव स्ट्रक्चर पर काम करता है—1 किलोग्राम प्लास्टिक कचरा लाने वाले को 1 समय का पूरा भोजन (One Full Meal) मिलता है, जबकि 500 ग्राम प्लास्टिक कचरा देकर कोई भी नाश्ता (Breakfast or Snacks) कर सकता है। इस प्रक्रिया के जरिए नागरिकों से प्राप्त साफ और छंटाई किया हुआ (cleaned and segregated) प्लास्टिक सीधे शहर के सॉलिड एंड लिक्विड रिसोर्स मैनेजमेंट (SLRM) सेंटर की 'प्लास्टिक ग्रेन्युल यूनिट' में रीसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है। इससे यह पहल शहर के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम से सीधे जुड़ जाती है और नगर निगम का सफाई व छंटाई पर होने वाला अतिरिक्त खर्च और समय दोनों बचते हैं।
अंबिकापुर नगर निगम के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से जून 2026 तक इस कैफे के माध्यम से कुल 24,296 लोगों ने 20,077 किलोग्राम (20 टन से अधिक) प्लास्टिक कचरा जमा कर भोजन प्राप्त किया है। हर वर्ष के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2019 में 2,832 व्यक्तियों द्वारा 2,555 किग्रा, 2020 में 5,185 व्यक्तियों द्वारा 4,015 किग्रा, 2021 में 1,845 व्यक्तियों द्वारा 1,825 किग्रा, 2022 में 3,410 व्यक्तियों द्वारा 2,920 किग्रा, 2023 में 4,187 व्यक्तियों द्वारा 3,285 किग्रा, 2024 में 3,029 व्यक्तियों द्वारा 2,555 किग्रा, 2025 में 2,825 व्यक्तियों द्वारा 2,174 किग्रा और जनवरी से जून 2026 तक 983 व्यक्तियों द्वारा 748 किग्रा प्लास्टिक वेस्ट जमा किया जा चुका है। इससे सार्वजनिक स्थानों पर कचरा कम हुआ है और शहर की स्वच्छता व सुंदर बनावट में अभूतपूर्व सुधार आया है।
यह पहल स्थानीय स्तर पर सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) के सिद्धांत को लागू करती है और संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देती है। इसके तहत SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) से जल स्रोतों व शहर में सफाई, SDG 2 (शून्य भूख) से जरूरतमंदों को भोजन, SDG 11 (सस्टेनेबल शहर और समुदाय) से सुरक्षित व टिकाऊ शहर, SDG 12 (जिम्मेदारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन) से प्लास्टिक पुनर्चक्रण, और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) से पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। खुद की कमाई से चलने वाला अंबिकापुर का यह वेंडर मॉडल देश के अन्य नगरीय निकायों के लिए भी आसानी से अपनाने योग्य है। अंबिकापुर द्वारा संचालित 'गार्बेज कैफे' यह दर्शाता है कि बेहतर योजना से प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और शहरी स्वच्छता को कैसे मजबूती दी जा सकती है। यह पहल देश भर के नगरीय निकायों के लिए पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और जन-सेवा का एक व्यावहारिक व सस्टेनेबल उदाहरण है।