स्वच्छ भारत मिशन–अर्बन (SBM-U) के तहत राजकोट शहर में एक अनोखी और सराहनीय पहल शुरू की गई है, जिसमें मंदिरों से निकलने वाले पवित्र कचरे को अब बोझ नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखा जा रहा है। शहर के प्रमुख मंदिरों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में फूल, माला और अन्य धार्मिक सामग्री निकलती है, जो पूजा के बाद बेकार हो जाती थी और कचरा प्रबंधन की चुनौती बनती थी। प्रोजेक्ट SWARaH (Sacred Waste Awareness, Recycling & Handcrafting) के तहत अब पूजा-पाठ के बाद बेकार माने जाने वाले फूल महिला सशक्तिकरण और सर्कुलर इकॉनमी का माध्यम बन रहे हैं। शुरुआती दौर में शहर के कुछ ही बड़े मंदिरों को इस परियोजना से जोड़ा गया, जहां कचरे को इस तरह एकत्र करने की व्यवस्था की गई कि उसका अधिकतम हिस्सा रीसाइक्लिंग के योग्य रहे। पहले अधिकांश मंदिरों का कचरा सीधे नगर निगम के कचरे में चला जाता था, वहीं भक्तों द्वारा प्लास्टिक थैलियों में चढ़ावा चढ़ाने की वजह से लैंडफिल साइट पर कचरे का पृथक्करण मुश्किल हो जाता था।
राजकोट के मंदिरों और धार्मिक स्थलों से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कचरा या तो लैंडफिल में चला जाता था या जल स्रोतों में विसर्जित किया जाता था। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होता था, बल्कि नगर निगम पर कचरा निपटान का अतिरिक्त बोझ भी बढ़ रहा था। इसी चुनौती को अवसर में बदलने के उद्देश्य से नगर निगम ने INTACH राजकोट चैप्टर के सहयोग से प्रोजेक्ट SWARAH की परिकल्पना की। इस परियोजना के अंतर्गत शहर के 18 वार्डों में मंदिरों पर कलर-कोडेड डस्टबिन लगाए गए हैं और एक निर्धारित वाहन के माध्यम से पुष्प कचरे को अलग से संग्रहित किया जा रहा है। एकत्रित कचरे को प्रोसेसिंग यूनिट में ले जाकर स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं द्वारा खाद, अगरबत्ती, सीड पेपर और प्राकृतिक रंग जैसे ईको-फ्रेंडली उत्पादों में बदला जाता है। महिलाओं और समुदाय के सदस्यों को खाद निर्माण, अगरबत्ती और सीड पेपर बनाने, प्राकृतिक रंग निकालने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
उत्पादन के बाद तैयार खाद का उपयोग नगर निगम के उद्यानों में किया जा रहा है, वहीं अन्य उत्पादों को प्रदर्शनियों, मंदिर परिसरों और शहरी आयोजनों के माध्यम से बेचा भी जा रहा है। इससे परियोजना को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत लगभग 1,000 से 2,000 वर्ग मीटर का प्रोसेसिंग क्षेत्र, वाहन, मंदिरों में डस्टबिन और आवश्यक मशीनरी की व्यवस्था की गई है। इस मॉडल से महिलाओं को सम्मानजनक रोजगार और कौशल विकास का अवसर मिल रहा है, वहीं लैंडफिल में जाने वाले जैविक कचरे में भी उल्लेखनीय कमी आ रही है। इस पहल को और मजबूत करने के लिए विरासत और शिल्प से जुड़े संगठनों द्वारा स्वयं सहायता समूहों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि पवित्र कचरे से बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाए जा सकें। प्रशिक्षण में इस बात पर भी जोर दिया जा रहा है कि मंदिरों में संग्रहण की प्रक्रिया सुधारी जाए। कुछ मंदिरों ने तो अपने ही कचरे से बने उत्पादों को दोबारा उपयोग करने की सहमति भी दी है। नगर निगम अब इस अभियान में और स्वयंसेवी संस्थाओं को जोड़ रहा है। औसतन एक मंदिर से प्रतिदिन करीब 20 किलोग्राम कचरा निकलता है, जो एकादशी और त्योहारों के दिनों में कहीं अधिक हो जाता है। फिलहाल परियोजना का मुख्य फोकस महिलाओं को प्रशिक्षण और रोजगार से जोड़ने पर है।
नगर निगम द्वारा पुष्प कचरे की मात्रा, खाद उत्पादन, उत्पादों की बिक्री और मंदिरों की भागीदारी जैसे संकेतकों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। यह पहल न केवल राजकोट को स्वच्छता के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है, बल्कि अन्य शहरी निकायों के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बनेगी। आस्था, पर्यावरण और आजीविका के इस अनूठे संगम के साथ प्रोजेक्ट SWARaH यह संदेश देता है कि यदि सोच सही हो, तो कचरा भी आत्मनिर्भर समाज की नींव बन सकता है।