शहरी स्वच्छता की परिभाषा अब केवल कूड़ा उठाने तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि उस कूड़े को एक मूल्यवान संसाधन में परिवर्तित करना भी वास्तविक सफलता को दर्शाता है। आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA) के स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U) 2.0 के तहत 'कचरा मुक्त शहर' - (Garbage Free Cities - GFCs) के संकल्प की ओर अग्रसर गाजियाबाद ने एक ऐसी ही मिसाल पेश की है। शहर में सड़कों, डेयरियों और विशेषकर गौशालाओं से निकलने वाले गोबर (Cow Dung) को पुन: उपयोग में लाया जा रहा है। ऐसा गौ-वंश अपशिष्ट जो पहले अक्सर नालियों के जाम होने और गंदगी का मुख्य कारण बनता था, अब वैज्ञानिक पद्धति से प्रबंधित किया जा रहा है और इस पशु अपशिष्ट को 'प्राकृतिक पेंट' के रूप में परिवर्तित कर एक नया जीवन दिया जा रहा है।
स्वच्छता की पहल और कचरा प्रबंधन का नया मॉडल : नगर निगम के लिए सबसे बड़ी चुनौती पशुओं के गोबर का सही निपटान करना था, क्योंकि लैंडफिल साइट्स पर लंबे समय तक पड़ा रहने वाला गोबर अन्य कचरे के साथ मिलकर मीथेन जैसी हानिकारक गैसें छोड़ता है, जो पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए निगम ने 'अपशिष्ट से संपदा' (Waste to Wealth) का मंत्र अपनाते हुए एक सर्कुलर अर्थव्यवस्था (Circular Economy) का मॉडल पेश किया है। इस प्रक्रिया के तहत, शहर की डेयरियों व गौशालाओं से गायों का गोबर इकट्ठा किया जाता है, जिसे रिफाइनिंग मशीनों के जरिए शोधित कर उसका तरल हिस्सा (अर्क) निकाला जाता है। उच्च तापमान पर प्रोसेसिंग के बाद इससे गंध और बैक्टीरिया को पूरी तरह खत्म कर दिया जाता है और फिर चूना, जस्ता एवं प्राकृतिक गोंद जैसे खनिजों को मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाला 'शीतलता प्रदान करने वाला पेंट' (Cooling Rooftop Paint) तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में 100 किलो गोबर से लगभग 30 से 40 लीटर तक प्राकृतिक पेंट तैयार हो जाता है, जो लैंडफिल पर पड़ने वाले बोझ को सीधे तौर पर कम कर रहा है।
आर्थिक सशक्तीकरण और वास्तविक प्राकृतिक लाभ : यह परियोजना रोजगार और आय का ठोस जरिया भी बन गई है। इस पहल का संचालन महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा किया जा रहा है, जिससे महिलाओं को अपने क्षेत्र में ही आजीविका के सम्मानजनक अवसर मिल रहे हैं। गौ-वंश अपशिष्ट के रूप में मिलने वाला गोबर जैसा कच्चा माल स्थानीय स्तर पर बहुत कम लागत में उपलब्ध है, इसलिए तैयार पेंट की कीमत बाजार में मिलने वाले रासायनिक पेंट की तुलना में काफी किफायती है। साथ ही, इस प्राकृतिक पेंट के उपयोग से घरों के अंदर का तापमान 3°C से 5°C तक कम रह सकता है, जिससे भीषण गर्मी के दौरान बिजली की बचत होती है और जहरीले रसायनों (Volatile Organic Compounds - VOCs) के खतरे से भी मुक्ति मिलती है। यह पहल एक साथ तीन समस्याओं — गंदगी, शहरी गर्मी (Heat Stress) और रोजगार की कमी — का प्रभावी समाधान करती है।
वैश्विक मंच पर गाजियाबाद का गौरव : गाजियाबाद के इस पहल और स्वच्छता के प्रति समर्पण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक सराहना मिली है। शहर को ‘ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज मेयर्स चैलेंज 2025’ में दुनिया के 630 शहरों में से शीर्ष 24 विजेता शहरों में चुना गया है। मई-अक्टूबर 2025 के बीच ‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ (UNDP) के सहयोग से सफल परीक्षण (Prototyping) के बाद, अब शहर को इस समाधान को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए 1 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 8.4 करोड़ रुपये) की अनुदान राशि मिलेगी। गाजियाबाद यह वैश्विक सम्मान पाने वाला भारत का दूसरा शहर बन गया है। इससे पहले ओडिशा के राउरकेला ने 2021 में सौर ऊर्जा संचालित कोल्ड स्टोरेज (मूंछ मार्केट पहल) के जरिए यह प्रतिष्ठित जीत हासिल की थी।
नगर निगम ने नंदग्राम में पहली ऑर्गेनिक पेंट उत्पादन इकाई सफलतापूर्वक शुरू कर दी है, जहां महिला स्वयं सहायता समूहों को उत्पादन और उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। भविष्य की योजना इस मॉडल का पूरे शहर में विस्तार कर अधिक से अधिक महिला समूहों को जोड़ने की है। निगम का ध्यान अब गौ-वंश अपशिष्ट (गोबर) से बने इस पर्यावरण-हितकारी पेंट की बाजार में पहुंच बढ़ाना है, ताकि सरकारी संस्थानों के साथ-साथ आम नागरिक भी इसे अपना सकें। यह प्रयास गाजियाबाद को सतत विकास का एक वैश्विक मॉडल बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।